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मंजिल की ओर

मंजिल कहाँ है, मै कहाँ हूं? कही तो हूं या नही भी क्या फर्क पड़ता है। चला मंजिल की ओर पर कौन सी मंजिल? ये ना पता था.. बस चल दिया, चल दिया,बिन सोचे बिन समझे गया बहुत दूर भी, पर मंजिल तो तय न था सो भटक गया  उस वीरान से मन मोहते जंगल मे, पर रास्ते की तलाश में  निकल पड़ा फिर से छोटे-छोटे कदमो से पहुँच जाऊंगा मंजिल पर  अब नही तो तब।

एक छोटी गोरैया।

आई घर के आंगन में, कुछ बोला उसने पर सुना न किसी ने उस वक़्त, चु चु करके घर आगंन में, छतो पर, पेड़ो पर आई हर बार पर सुना न किसी ने फुदकते फुदकते अपने छोटे छोटे पैरो से मन मोह लेती थी सबका एक छोटी गोरैया पर उस वक़्त सुना न किसी ने।।

तलाश

हर तरफ शान्ति है मायूसी हे, मै  हू की उसमे भी ख़ुशी तलाश कर रहा, पर नहीं हो पाया खुश, कहा से हो पाता... मायूसी से भरे समन्दर मे ख़ुशी जो तालाश कर रहा था... उस आने वाले ख़ुशी की तलाश मे आज की ख़ुशी पर ताला लगा दीया था... धड़कन रुक सी गई थी ऐसा महसूस होने लगा था... समां भी थम सा गया था, वीरान सा था चारो तरफ.. फिर भी निकल पड़ा ख़ुशी की तलाश मे, उसी समन्दर की तरफ जहां शायद ही मिले वो... देखते है क्या हे वहाँ?? 

एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो।

एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो, वक़्त के साथ उन्हें भी खेलने दो, दो उसे मुकाम एक,छू लेगी वो भी आसमानो को, पर उसे खिलने का मौका तो दो मार दिया हमने उसे,उसके पनपने से पहले, क्या रीती रिवाज?क्या भेदभाव? समय के साथ थोड़ा उन्हें भी बदलने दो, खुद को न बदल पाओ तो अपने ख्यालात बदल दो, पर एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो। सोचा है कभी तुमने, अगर न लेने दोगे जन्म इन्हें, तो कौन कहेगा कहानियां प्यारी? तो कौन कहेगा लोरियां सारी? किनको कहोगो दादी नानी? किसको,किसको तुम 'माँ' कहोगे? अब बस ! रोक लो खुद को आने दो एक मुस्कान उस चेहरे पर भी, आने दो आने के बाद भी मत करो ऐसा काम कि खुद से निच कहाओ। कोई एक आता हे, सिखाता हे, समझाता हे पर, पर फिर भी तुम वही बन जाते हो  जो तुम पहले थे। एक तरफ उनकी करते हो पूजा,आराधना, फिर भी उन्ही से खेलवाड़ करते हो। एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो।