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एक छोटी गोरैया।

आई घर के आंगन में, कुछ बोला उसने पर सुना न किसी ने उस वक़्त, चु चु करके घर आगंन में, छतो पर, पेड़ो पर आई हर बार पर सुना न किसी ने फुदकते फुदकते अपने छोटे छोटे पैरो से मन मोह लेती थी सबका एक छोटी गोरैया पर उस वक़्त सुना न किसी ने।।

तलाश

हर तरफ शान्ति है मायूसी हे, मै  हू की उसमे भी ख़ुशी तलाश कर रहा, पर नहीं हो पाया खुश, कहा से हो पाता... मायूसी से भरे समन्दर मे ख़ुशी जो तालाश कर रहा था... उस आने वाले ख़ुशी की तलाश मे आज की ख़ुशी पर ताला लगा दीया था... धड़कन रुक सी गई थी ऐसा महसूस होने लगा था... समां भी थम सा गया था, वीरान सा था चारो तरफ.. फिर भी निकल पड़ा ख़ुशी की तलाश मे, उसी समन्दर की तरफ जहां शायद ही मिले वो... देखते है क्या हे वहाँ?? 

एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो।

एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो, वक़्त के साथ उन्हें भी खेलने दो, दो उसे मुकाम एक,छू लेगी वो भी आसमानो को, पर उसे खिलने का मौका तो दो मार दिया हमने उसे,उसके पनपने से पहले, क्या रीती रिवाज?क्या भेदभाव? समय के साथ थोड़ा उन्हें भी बदलने दो, खुद को न बदल पाओ तो अपने ख्यालात बदल दो, पर एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो। सोचा है कभी तुमने, अगर न लेने दोगे जन्म इन्हें, तो कौन कहेगा कहानियां प्यारी? तो कौन कहेगा लोरियां सारी? किनको कहोगो दादी नानी? किसको,किसको तुम 'माँ' कहोगे? अब बस ! रोक लो खुद को आने दो एक मुस्कान उस चेहरे पर भी, आने दो आने के बाद भी मत करो ऐसा काम कि खुद से निच कहाओ। कोई एक आता हे, सिखाता हे, समझाता हे पर, पर फिर भी तुम वही बन जाते हो  जो तुम पहले थे। एक तरफ उनकी करते हो पूजा,आराधना, फिर भी उन्ही से खेलवाड़ करते हो। एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो।

बस एक सोच।

एक खुबसूरत सी कहानी रच रहा था,  ना जाने क्यों फिर भी अधूरा सा लगता था, कभी कुछ था,कभी ना था... लेकिन कुछ तो था, जिससे कहानी खुबसूरत सी होती जा रही थी.. लेकिन वो था क्या? समझ से परे था। कभी अपने होने पर सके करता था तो कभी अपनी मायूसी पर.. सब तो था पास मगर कुछ तो कमी थी?? क्या थी कमी? क्या वो एक अधूरी कहानी सा मोड़ ले रही थी?? बहुत से प्रश्न उठ रहे थे मन में?? पर कोई उत्तर बताने वाला ना था। जाऊ तो जाऊ कहा? कौन इस वक़्त में साथ देगा ?? कोई तो? या कोई भी नी? जो भी था शायद खुद से उत्तर माँगना था। तो सुरु किया अपने आप से प्रश्न करना। सारे प्रश्न कर डाले अपने अंतर्मन से, लेकिन उत्तर कहा से मिलता? मन में तो बस प्रश्न ही थे... उदास होके बैठ गया एकांत जगह पर। आंसू की लड़ी बह रही थी आँखों से। खो गया अपने ही प्रश्न मै, उत्तर की तलाश मै.. कौन हूं मे? क्यों हु मे? क्या कभी कुछ ऐसा ना कर पाउँगा जो कहानी कह रही मेरी?? हार नहीं मानूँगा बढूंगा आगे। अब देखते हे वक़्त और में कब तक हौशला रखते हे। जो था सो था,अब जो हे वो हे,जो होगा वो तो होगा। बढ़ना...