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शायद कुछ कर दिखाऊ

कुछ पुराना ही करू या कुछ नया कर दिखाऊ या नया को अपनाऊ या ना भी अपनाऊ, सपनो में खो के दिखाऊ या सपनो को पूरा कर दिखाऊ, चल के दिखाऊ, दौड़ के दिखाऊ उड़ के दिखाऊ, तैर के दिखाऊ रो के दिखाऊ, हँस के दिखाऊ बिछड़ के दिखाऊ, मिल के दिखाऊ मासूमियत को अपनाऊ, या नीच व बुरा बन जाऊं क्या बोल के सुनाऊ, क्या लिख के दिखाऊ दंगा कराऊ, या एकजुट कराऊ गरीबो को मार भगाऊ, या गरीबी मिटाऊ या अपने ही प्रश्नों में दफ़्न होके दिखाऊ शायद कुछ कर दिखाऊ।

मंजिल की ओर

मंजिल कहाँ है, मै कहाँ हूं? कही तो हूं या नही भी क्या फर्क पड़ता है। चला मंजिल की ओर पर कौन सी मंजिल? ये ना पता था.. बस चल दिया, चल दिया,बिन सोचे बिन समझे गया बहुत दूर भी, पर मंजिल तो तय न था सो भटक गया  उस वीरान से मन मोहते जंगल मे, पर रास्ते की तलाश में  निकल पड़ा फिर से छोटे-छोटे कदमो से पहुँच जाऊंगा मंजिल पर  अब नही तो तब।

एक छोटी गोरैया।

आई घर के आंगन में, कुछ बोला उसने पर सुना न किसी ने उस वक़्त, चु चु करके घर आगंन में, छतो पर, पेड़ो पर आई हर बार पर सुना न किसी ने फुदकते फुदकते अपने छोटे छोटे पैरो से मन मोह लेती थी सबका एक छोटी गोरैया पर उस वक़्त सुना न किसी ने।।

तलाश

हर तरफ शान्ति है मायूसी हे, मै  हू की उसमे भी ख़ुशी तलाश कर रहा, पर नहीं हो पाया खुश, कहा से हो पाता... मायूसी से भरे समन्दर मे ख़ुशी जो तालाश कर रहा था... उस आने वाले ख़ुशी की तलाश मे आज की ख़ुशी पर ताला लगा दीया था... धड़कन रुक सी गई थी ऐसा महसूस होने लगा था... समां भी थम सा गया था, वीरान सा था चारो तरफ.. फिर भी निकल पड़ा ख़ुशी की तलाश मे, उसी समन्दर की तरफ जहां शायद ही मिले वो... देखते है क्या हे वहाँ??