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Showing posts with the label HINDI POETRY

कौन हूँ मैं?

मैं हिमालय हूँ मैं ऊँचा वृक्ष हूँ मैं होले से बहता हवा का झोंका हूँ, जो गाँव-गाँव व शहर-शहर बह रहा हैं, मैं एक नदी हूँ जो घाटियों से निकल, नीचे बह रहा हैं मैं वो नेत्र हूँ जो दूर भविष्य को साफ देखता हैं, अगर तुमसे कोई पूछे, कौन हूँ मैं? तुम खड़े होना और कहना, मैं विशाल हूँ मैं बादलों के ऊपर उड़ता हुआ बाज हूँ, मैं एक शेर हूँ जो इन घनघोर जंगलों में वाश करता हैं, मैं वो भीड़ हूँ जो दूसरो की मदद करता हैं, मैं सर्वशक्तिमान हूँ, अगर तुमसे कोई पूछे, कौन हूँ मैं? तुम खड़े होना और कहना, मैं पर्वत की ऊँची चोटी हूँ मैं आकाश में टिमटिमाता तारा हूँ मैं एक छोटी सी आशा की किरण हूँ मेरे साथ सभी रस्सी से जुड़ें हैं, और मैं महसूस करता हूँ कि इस संसार को मैं महान बनाता हूँ, जिंदगी के दौड़-भाग में, प्रेम के दो बूँद गिराता चल और ये संसार तुम्हें घोषित करेगा, महान एक दिन। @Rajnish

मन का पक्षी

मन का पक्षी उड़ा गगन में कभी इधर तो कभी उधर ज़मी से उड़ा था छूने नीले गगन को, भटका वो खूबसूरती को देख उतरा ज़मी पर ना लगा ध्यान उसका फिर से उड़ा फिर भटका, थक हार के आया ज़मी पर ना था उसका कोई एक ठिकाना जाता कहा वो? उसने लिया साहस से काम निकला वो जंगलों के बीच किया इकठ्ठा तिनकों को, दे पसीना-दे पसीना बना डाला अपना एक ठिकाना, अब न भटका अब न रोया क्योंकि था उसका एक ठिकाना मन का पक्षी उड़ा गगन में बिन तनाव, बिन परेशानी।

काली रात

ये काली रात लाल रात में गुजर रहीं, हम बड़े हो चाहे छोटे हस्पताल घूम के गुजर रही सबके दुआवो को इकठ्ठा कर चल पड़े सीधी पकडण्डी पकड़, खून के छीटों ने साहस को दबा दिया पर हम भी क्या कम थे उसे पटक के हरा दिया ये काली रात लाल रात में गुजर रहीं कुछ दिनों से धड़कनो का बुरा हाल है वो रो रहे कराह रहे चारों तरफ से बस दर्द की आवाज है पर मन ने कहा "शांत रह तू मस्त है" बिस्तर ने थपकी लगा के चैन दी ये काली रात लाल रात में गुजर रही।

शायद कुछ कर दिखाऊ

कुछ पुराना ही करू या कुछ नया कर दिखाऊ या नया को अपनाऊ या ना भी अपनाऊ, सपनो में खो के दिखाऊ या सपनो को पूरा कर दिखाऊ, चल के दिखाऊ, दौड़ के दिखाऊ उड़ के दिखाऊ, तैर के दिखाऊ रो के दिखाऊ, हँस के दिखाऊ बिछड़ के दिखाऊ, मिल के दिखाऊ मासूमियत को अपनाऊ, या नीच व बुरा बन जाऊं क्या बोल के सुनाऊ, क्या लिख के दिखाऊ दंगा कराऊ, या एकजुट कराऊ गरीबो को मार भगाऊ, या गरीबी मिटाऊ या अपने ही प्रश्नों में दफ़्न होके दिखाऊ शायद कुछ कर दिखाऊ।

मंजिल की ओर

मंजिल कहाँ है, मै कहाँ हूं? कही तो हूं या नही भी क्या फर्क पड़ता है। चला मंजिल की ओर पर कौन सी मंजिल? ये ना पता था.. बस चल दिया, चल दिया,बिन सोचे बिन समझे गया बहुत दूर भी, पर मंजिल तो तय न था सो भटक गया  उस वीरान से मन मोहते जंगल मे, पर रास्ते की तलाश में  निकल पड़ा फिर से छोटे-छोटे कदमो से पहुँच जाऊंगा मंजिल पर  अब नही तो तब।

एक छोटी गोरैया।

आई घर के आंगन में, कुछ बोला उसने पर सुना न किसी ने उस वक़्त, चु चु करके घर आगंन में, छतो पर, पेड़ो पर आई हर बार पर सुना न किसी ने फुदकते फुदकते अपने छोटे छोटे पैरो से मन मोह लेती थी सबका एक छोटी गोरैया पर उस वक़्त सुना न किसी ने।।

तलाश

हर तरफ शान्ति है मायूसी हे, मै  हू की उसमे भी ख़ुशी तलाश कर रहा, पर नहीं हो पाया खुश, कहा से हो पाता... मायूसी से भरे समन्दर मे ख़ुशी जो तालाश कर रहा था... उस आने वाले ख़ुशी की तलाश मे आज की ख़ुशी पर ताला लगा दीया था... धड़कन रुक सी गई थी ऐसा महसूस होने लगा था... समां भी थम सा गया था, वीरान सा था चारो तरफ.. फिर भी निकल पड़ा ख़ुशी की तलाश मे, उसी समन्दर की तरफ जहां शायद ही मिले वो... देखते है क्या हे वहाँ?? 

एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो।

एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो, वक़्त के साथ उन्हें भी खेलने दो, दो उसे मुकाम एक,छू लेगी वो भी आसमानो को, पर उसे खिलने का मौका तो दो मार दिया हमने उसे,उसके पनपने से पहले, क्या रीती रिवाज?क्या भेदभाव? समय के साथ थोड़ा उन्हें भी बदलने दो, खुद को न बदल पाओ तो अपने ख्यालात बदल दो, पर एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो। सोचा है कभी तुमने, अगर न लेने दोगे जन्म इन्हें, तो कौन कहेगा कहानियां प्यारी? तो कौन कहेगा लोरियां सारी? किनको कहोगो दादी नानी? किसको,किसको तुम 'माँ' कहोगे? अब बस ! रोक लो खुद को आने दो एक मुस्कान उस चेहरे पर भी, आने दो आने के बाद भी मत करो ऐसा काम कि खुद से निच कहाओ। कोई एक आता हे, सिखाता हे, समझाता हे पर, पर फिर भी तुम वही बन जाते हो  जो तुम पहले थे। एक तरफ उनकी करते हो पूजा,आराधना, फिर भी उन्ही से खेलवाड़ करते हो। एक मुस्कान उस चेहरे पर भी आने दो।

बस एक सोच।

एक खुबसूरत सी कहानी रच रहा था,  ना जाने क्यों फिर भी अधूरा सा लगता था, कभी कुछ था,कभी ना था... लेकिन कुछ तो था, जिससे कहानी खुबसूरत सी होती जा रही थी.. लेकिन वो था क्या? समझ से परे था। कभी अपने होने पर सके करता था तो कभी अपनी मायूसी पर.. सब तो था पास मगर कुछ तो कमी थी?? क्या थी कमी? क्या वो एक अधूरी कहानी सा मोड़ ले रही थी?? बहुत से प्रश्न उठ रहे थे मन में?? पर कोई उत्तर बताने वाला ना था। जाऊ तो जाऊ कहा? कौन इस वक़्त में साथ देगा ?? कोई तो? या कोई भी नी? जो भी था शायद खुद से उत्तर माँगना था। तो सुरु किया अपने आप से प्रश्न करना। सारे प्रश्न कर डाले अपने अंतर्मन से, लेकिन उत्तर कहा से मिलता? मन में तो बस प्रश्न ही थे... उदास होके बैठ गया एकांत जगह पर। आंसू की लड़ी बह रही थी आँखों से। खो गया अपने ही प्रश्न मै, उत्तर की तलाश मै.. कौन हूं मे? क्यों हु मे? क्या कभी कुछ ऐसा ना कर पाउँगा जो कहानी कह रही मेरी?? हार नहीं मानूँगा बढूंगा आगे। अब देखते हे वक़्त और में कब तक हौशला रखते हे। जो था सो था,अब जो हे वो हे,जो होगा वो तो होगा। बढ़ना...

ममता।

प्यार है,ममता है,  उस माँ की आँखों में।  वो सूरज है न,  अरे! वही सूरज जो सुबह-सुबह क्षितिज से निकलता है, और सबको जगमगाती रौशनी से भर देता हे।  उसकी भी एक माँ होगी। जो उसके उठने से पहले उठ जाती होगी, अपने फुल से बच्चे के लिये।  वो माँ उसके लिए नास्ता तैयार करती होंगी। फिर जब वो उठता न होगा तो वो   उसके पास आके उसे उठाती होंगी।   और कहती होंगी,"उठ,जल्दी उठ!   देख सुबह होने का समय हो गया। तुझे सब बुला रहे हे।   उठ जा बेटे।" और न उठने पर क्या उसे भी उसके पिता   आके उसके उप्पर पानी डालते होंगे?  या उसको उसके बिस्तर से गिरा देते होंगे?  तब क्या सूरज की माँ अपने उनको डांटती होंगी?  की हटो जी,"क्यों बच्चे को परेशान कर रहे हो?  मै उठा रही हु न।  आप जाओ अपना काम देखो।  फिर वो माँ अपने रोते हुए बच्चे को चुप करा के कहती होंगी,  अब उठ जा और जा क्षितिज की और  सब तेरे लिए तड़प रहे हे। फिर वो उठता होगा और अपने माँ-बाप का आशिर्वाद लेके क्षितिज की और जाता होगा, सबके ल...